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Question

निर्देश: निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए । 

भारतीय साहित्य के क्षेत्र में सर्वप्रथम सैद्धान्तिक आलोचना का विकास हुआ जिसे 'काव्य-शास्त्र' या 'अलंकार-शास्त्र' के नाम से पुकारा जाता रहा है । उपलब्ध ग्रंथों में प्राचीनतम रचना भरतमुनि द्वारा रचित 'नाट्य-शास्त्र' है जिसमें साहित्य के मानदण्ड के रूप में 'रस-सिद्धान्त' की प्रतिष्ठा की गई है । साहित्य का मूल तत्व भाव है: रस-सिद्धान्त की भाव और भावनाओं के उद्वेलन की प्रक्रिया का स्पष्टीकरण करता हुआ साहित्य की विषय-वस्तु का वर्गीकरण एवं विश्लेषण प्रस्तुत करता है : काव्य में भाव तत्व को सर्वाधिक महत्व प्रदान करके रस-सिद्धान्त के आचार्यों ने एक उचित दिशा में काव्य-शास्त्र को आगे बढाया । भारत के परवर्ती आचार्यों में से अनेक ने रस-सिद्धान्त के विभिन्न अस्पष्ट स्थलों की विस्तृत व्याख्या की, विशेषतः रस-निष्पत्ति की समस्या को लेकर भट्ट लोल्लट, शंकुक, भट्टनायक, अभिनव गुप्त, पंडितराज जगन्नाथ आदि ने अपने-अपने स्वतंत्र मत की प्रतिष्ठा की । आगे चलकर भामह, उद्भट, दण्डी आदि आचार्यों ने रस के स्थान पर काव्य की आत्मा के रूप में 'अलंकार' की प्रतिष्ठा की । अलंकार के सम्बन्ध में उनकी धारणाएँ बहुत व्यापक थीं, वे उसे 'सौन्दर्य' के पर्यायवाची के रूप में ग्रहण करते थे । परवर्ती युग में वामन के द्वारा 'रीति-सम्प्रदाय' की, कुंतक के द्वारा 'वक्रोक्ति सम्प्रदाय' की तथा आनन्द वर्द्धनाचार्य द्वारा 'ध्वनि सम्प्रदाय' की प्रतिष्ठा हुई, जिन्होंने क्रमशः रीति, वक्रोक्ति एवं ध्वनि को काव्य की आत्मा के रूप में स्वीकार किया । क्षेमेन्द्र ने इन सभी के उचित प्रयोग को महत्वपूर्ण मानते हुए 'औचित्य सम्प्रदाय' की स्थापना की । मम्मट, विश्वनाथ, पंडितराज जगन्नाथ आदि व्याख्याताओं ने क्षेमेन्द्र के दृष्टिकोण को अपनाते हुए अपने काव्य-शास्त्रीय ग्रंथों में रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि सभी का विवेचन किया है ।

भारत के परवर्ती आचार्यों ने विशेषतः ___________________ की समस्या को लेकर भट्ट लोल्लट, शंकुक, भट्टनायक, अभिनव गुप्त, पंडितराज जगन्नाथ आदि ने अपने-अपने स्वतंत्र मत की प्रतिष्ठा की ।

This question was previously asked in
UPSSSC PET 2025 Question Paper (07-Sep-2025) (Shift-2)
The correct answer is
रस-निष्पत्ति

गद्यांश का विश्लेषण

यह प्रश्न भारतीय साहित्य के इतिहास से संबंधित एक गद्यांश पर आधारित है। गद्यांश में साहित्य की सैद्धान्तिक आलोचना, जिसे 'काव्य-शास्त्र' या 'अलंकार-शास्त्र' कहा जाता है, के विकास पर चर्चा की गई है। इसमें सर्वप्रथम भरतमुनि के 'नाट्य-शास्त्र' और उसमें प्रतिपादित 'रस-सिद्धान्त' का उल्लेख है। गद्यांश यह भी बताता है कि साहित्य का मूल तत्व 'भाव' है और रस-सिद्धान्त भावों की प्रक्रिया का विश्लेषण करता है।

गद्यांश के अनुसार, भारतीय साहित्य के परवर्ती आचार्यों ने रस-सिद्धान्त के विभिन्न अस्पष्ट पहलुओं पर विस्तार से लिखा। विशेष रूप से, उन्होंने एक महत्वपूर्ण समस्या पर ध्यान केंद्रित किया, जिसके कारण भट्ट लोल्लट, शंकुक, भट्टनायक, अभिनव गुप्त, और पंडितराज जगन्नाथ जैसे विद्वानों ने अपने स्वतंत्र विचार प्रस्तुत किए।

प्रश्न का संदर्भ

प्रश्न सीधे गद्यांश के एक वाक्य को उद्धृत करता है जिसमें इन परवर्ती आचार्यों का उल्लेख है और एक खाली स्थान भरने को कहता है। वाक्य इस प्रकार है:

"भारत के परवर्ती आचार्यों ने विशेषतः ___________________ की समस्या को लेकर भट्ट लोल्लट, शंकुक, भट्टनायक, अभिनव गुप्त, पंडितराज जगन्नाथ आदि ने अपने-अपने स्वतंत्र मत की प्रतिष्ठा की ।"

सही विकल्प का निर्धारण

गद्यांश के निम्नलिखित वाक्य पर ध्यान केंद्रित करें:

"...विशेषतः रस-निष्पत्ति की समस्या को लेकर भट्ट लोल्लट, शंकुक, भट्टनायक, अभिनव गुप्त, पंडितराज जगन्नाथ आदि ने अपने-अपने स्वतंत्र मत की प्रतिष्ठा की ।"

यह वाक्य स्पष्ट रूप से बताता है कि जिन आचार्यों का उल्लेख प्रश्न में किया गया है, उन्होंने विशेष रूप से 'रस-निष्पत्ति की समस्या' पर कार्य किया और अपने स्वतंत्र मत स्थापित किए।

अब दिए गए विकल्पों का विश्लेषण करते हैं:

  • वक्रोक्ति: गद्यांश में वक्रोक्ति सम्प्रदाय की स्थापना का श्रेय कुंतक को दिया गया है, न कि प्रश्न में सूचीबद्ध आचार्यों के समूह को।
  • अलंकार: अलंकार को काव्य की आत्मा के रूप में भामह, उद्भट और दण्डी जैसे आचार्यों ने प्रतिष्ठापित किया था, न कि रस-निष्पत्ति की समस्या के संदर्भ में प्रश्न में सूचीबद्ध आचार्यों ने।
  • रस-निष्पत्ति: यह सीधे गद्यांश से मेल खाता है, जहाँ स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि भट्ट लोल्लट से लेकर पंडितराज जगन्नाथ तक के आचार्यों ने 'रस-निष्पत्ति की समस्या' पर अपने मत प्रस्तुत किए।
  • निर्णयात्मक पद्धति: गद्यांश में इस शब्द का प्रयोग या इस संदर्भ में कोई उल्लेख नहीं है।

इसलिए, गद्यांश के आधार पर सही उत्तर 'रस-निष्पत्ति' है।

निष्कर्ष

गद्यांश के अनुसार, भारत के परवर्ती आचार्यों जैसे भट्ट लोल्लट, शंकुक, भट्टनायक, अभिनव गुप्त, और पंडितराज जगन्नाथ ने विशेष रूप से रस-निष्पत्ति की समस्या को लेकर अपने स्वतंत्र मतों की प्रतिष्ठा की।

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