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SSC JHT 2025 Paper 1 Question Paper (12-Aug-2025); Download PDF

Download SSC JHT 2025 Paper 1 Question Paper (12 August 2025) PDF. The exam followed the SSC JHT Paper 1 pattern with objective-type multiple-choice questions (MCQs) from General Hindi and General English. This paper helps candidates understand the difficulty level, exam structure, and question distribution for effective preparation.

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SSC JHT 2025 Paper 1 Question Paper (12-Aug-2025)
120 Minutes
200 Questions
200 Marks
English
Showing 1 - 5 of 100 questions
Page 1 of 20

Q1.

निम्नलिखित में से कौन-सा वाक्य भारतीय हिंदी के स्थानीय संदर्भ में सबसे कम स्वाभाविक है?

Q2.

दिए गए अनुच्छेद से उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दें:

विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को अभूतपूर्व गति और सुविधा प्रदान की है। वह कार्य जो पहले घंटों में होते थे, अब मिनटों में पूरे हो जाते हैं। डिजिटल उपकरण, रोबोट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), और मशीन लर्निंग जैसे नवाचारों ने हमारे जीवन को सरल तो बनाया है, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाया है- क्या इस तकनीकी प्रगति की चमक में हम अपनी संवेदनाओं की ऊष्मा को तो नहीं खो रहे?
आज के युग में निर्णय लेने की प्रक्रिया तेजी से मानवीय विवेक से हटकर एल्गोरिदम और डेटा के आधार पर होने लगी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उन क्षेत्रों में प्रवेश कर रही है जहाँ पहले केवल मानवीय अनुभव, भावना और अंतःप्रज्ञा की आवश्यकता होती थी- जैसे चिकित्सा निर्णय, न्याय व्यवस्था, या यहां तक कि मानसिक परामर्श। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या ये यंत्र उस भावनात्मक गहराई, सहानुभूति और नैतिकता को समझ सकते हैं जो एक मनुष्य की आत्मा का मूल गुण है? प्रौद्योगिकी की यह दौड़ निस्संदेह तेज़ है, परंतु यह उस आत्मिक धीमेपन को नहीं समझती जिसमें एक इंसान का मूल चरित्र विकसित होता है। जब निर्णय मात्र तर्क और आँकड़ों पर आधारित हो जाते हैं, तब करुणा, नैतिकता, सह-अस्तित्व जैसे मानवीय मूल्य गौण होने लगते हैं। समाज में जब संवेदनाएँ यंत्रों के हवाले कर दी जाती हैं, तो निर्णय भले ही कुशल हों, लेकिन उनमें आत्मा का अभाव होता है।
इसलिए यह आवश्यक है कि हम विज्ञान और तकनीक का उपयोग करें, पर अंधानुकरण न करें। हम यंत्रों से गति ले सकते हैं, पर दिशा अपने अंतःकरण से ही चुननी होगी। तकनीक हमारी सेवा में होनी चाहिए, न कि हमारे विवेक और संवेदना को विस्थापित करने वाली शक्ति के रूप में।
सच यही है कि यदि हम तकनीक के साथ मानवता का संतुलन नहीं बनाएँगे, तो हम एक उन्नत समाज तो बन सकते हैं, पर एक सहृदय समाज नहीं।

गद्यांश के अनुसार तकनीकी प्रगति का सबसे बड़ा खतरा क्या है?

Q3.

दिए गए अनुच्छेद से उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दें:

विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को अभूतपूर्व गति और सुविधा प्रदान की है। वह कार्य जो पहले घंटों में होते थे, अब मिनटों में पूरे हो जाते हैं। डिजिटल उपकरण, रोबोट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), और मशीन लर्निंग जैसे नवाचारों ने हमारे जीवन को सरल तो बनाया है, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाया है- क्या इस तकनीकी प्रगति की चमक में हम अपनी संवेदनाओं की ऊष्मा को तो नहीं खो रहे?
आज के युग में निर्णय लेने की प्रक्रिया तेजी से मानवीय विवेक से हटकर एल्गोरिदम और डेटा के आधार पर होने लगी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उन क्षेत्रों में प्रवेश कर रही है जहाँ पहले केवल मानवीय अनुभव, भावना और अंतःप्रज्ञा की आवश्यकता होती थी- जैसे चिकित्सा निर्णय, न्याय व्यवस्था, या यहां तक कि मानसिक परामर्श। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या ये यंत्र उस भावनात्मक गहराई, सहानुभूति और नैतिकता को समझ सकते हैं जो एक मनुष्य की आत्मा का मूल गुण है? प्रौद्योगिकी की यह दौड़ निस्संदेह तेज़ है, परंतु यह उस आत्मिक धीमेपन को नहीं समझती जिसमें एक इंसान का मूल चरित्र विकसित होता है। जब निर्णय मात्र तर्क और आँकड़ों पर आधारित हो जाते हैं, तब करुणा, नैतिकता, सह-अस्तित्व जैसे मानवीय मूल्य गौण होने लगते हैं। समाज में जब संवेदनाएँ यंत्रों के हवाले कर दी जाती हैं, तो निर्णय भले ही कुशल हों, लेकिन उनमें आत्मा का अभाव होता है।
इसलिए यह आवश्यक है कि हम विज्ञान और तकनीक का उपयोग करें, पर अंधानुकरण न करें। हम यंत्रों से गति ले सकते हैं, पर दिशा अपने अंतःकरण से ही चुननी होगी। तकनीक हमारी सेवा में होनी चाहिए, न कि हमारे विवेक और संवेदना को विस्थापित करने वाली शक्ति के रूप में।
सच यही है कि यदि हम तकनीक के साथ मानवता का संतुलन नहीं बनाएँगे, तो हम एक उन्नत समाज तो बन सकते हैं, पर एक सहृदय समाज नहीं।

"यंत्रों से गति लें, पर दिशा अंतःकरण से चुनें" - इस वाक्य का अभिप्राय है:

Q4.

दिए गए अनुच्छेद से उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दें:

विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को अभूतपूर्व गति और सुविधा प्रदान की है। वह कार्य जो पहले घंटों में होते थे, अब मिनटों में पूरे हो जाते हैं। डिजिटल उपकरण, रोबोट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), और मशीन लर्निंग जैसे नवाचारों ने हमारे जीवन को सरल तो बनाया है, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाया है- क्या इस तकनीकी प्रगति की चमक में हम अपनी संवेदनाओं की ऊष्मा को तो नहीं खो रहे?
आज के युग में निर्णय लेने की प्रक्रिया तेजी से मानवीय विवेक से हटकर एल्गोरिदम और डेटा के आधार पर होने लगी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उन क्षेत्रों में प्रवेश कर रही है जहाँ पहले केवल मानवीय अनुभव, भावना और अंतःप्रज्ञा की आवश्यकता होती थी- जैसे चिकित्सा निर्णय, न्याय व्यवस्था, या यहां तक कि मानसिक परामर्श। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या ये यंत्र उस भावनात्मक गहराई, सहानुभूति और नैतिकता को समझ सकते हैं जो एक मनुष्य की आत्मा का मूल गुण है? प्रौद्योगिकी की यह दौड़ निस्संदेह तेज़ है, परंतु यह उस आत्मिक धीमेपन को नहीं समझती जिसमें एक इंसान का मूल चरित्र विकसित होता है। जब निर्णय मात्र तर्क और आँकड़ों पर आधारित हो जाते हैं, तब करुणा, नैतिकता, सह-अस्तित्व जैसे मानवीय मूल्य गौण होने लगते हैं। समाज में जब संवेदनाएँ यंत्रों के हवाले कर दी जाती हैं, तो निर्णय भले ही कुशल हों, लेकिन उनमें आत्मा का अभाव होता है।
इसलिए यह आवश्यक है कि हम विज्ञान और तकनीक का उपयोग करें, पर अंधानुकरण न करें। हम यंत्रों से गति ले सकते हैं, पर दिशा अपने अंतःकरण से ही चुननी होगी। तकनीक हमारी सेवा में होनी चाहिए, न कि हमारे विवेक और संवेदना को विस्थापित करने वाली शक्ति के रूप में।
सच यही है कि यदि हम तकनीक के साथ मानवता का संतुलन नहीं बनाएँगे, तो हम एक उन्नत समाज तो बन सकते हैं, पर एक सहृदय समाज नहीं।

Q5.

दिए गए अनुच्छेद से उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दें:

विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को अभूतपूर्व गति और सुविधा प्रदान की है। वह कार्य जो पहले घंटों में होते थे, अब मिनटों में पूरे हो जाते हैं। डिजिटल उपकरण, रोबोट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), और मशीन लर्निंग जैसे नवाचारों ने हमारे जीवन को सरल तो बनाया है, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाया है- क्या इस तकनीकी प्रगति की चमक में हम अपनी संवेदनाओं की ऊष्मा को तो नहीं खो रहे?
आज के युग में निर्णय लेने की प्रक्रिया तेजी से मानवीय विवेक से हटकर एल्गोरिदम और डेटा के आधार पर होने लगी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उन क्षेत्रों में प्रवेश कर रही है जहाँ पहले केवल मानवीय अनुभव, भावना और अंतःप्रज्ञा की आवश्यकता होती थी- जैसे चिकित्सा निर्णय, न्याय व्यवस्था, या यहां तक कि मानसिक परामर्श। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या ये यंत्र उस भावनात्मक गहराई, सहानुभूति और नैतिकता को समझ सकते हैं जो एक मनुष्य की आत्मा का मूल गुण है? प्रौद्योगिकी की यह दौड़ निस्संदेह तेज़ है, परंतु यह उस आत्मिक धीमेपन को नहीं समझती जिसमें एक इंसान का मूल चरित्र विकसित होता है। जब निर्णय मात्र तर्क और आँकड़ों पर आधारित हो जाते हैं, तब करुणा, नैतिकता, सह-अस्तित्व जैसे मानवीय मूल्य गौण होने लगते हैं। समाज में जब संवेदनाएँ यंत्रों के हवाले कर दी जाती हैं, तो निर्णय भले ही कुशल हों, लेकिन उनमें आत्मा का अभाव होता है।
इसलिए यह आवश्यक है कि हम विज्ञान और तकनीक का उपयोग करें, पर अंधानुकरण न करें। हम यंत्रों से गति ले सकते हैं, पर दिशा अपने अंतःकरण से ही चुननी होगी। तकनीक हमारी सेवा में होनी चाहिए, न कि हमारे विवेक और संवेदना को विस्थापित करने वाली शक्ति के रूप में।
सच यही है कि यदि हम तकनीक के साथ मानवता का संतुलन नहीं बनाएँगे, तो हम एक उन्नत समाज तो बन सकते हैं, पर एक सहृदय समाज नहीं।

लेखक का तकनीक के प्रति दृष्टिकोण कैसा है?

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