"काव्य शास्त्र के सिद्धांतो से ऊपर उठकर सौन्दर्य का उद्धाटन करना ही आलोचक का प्रधान कार्य है I" यह किसका मत है?
नंद दुलारे वाजपेयी
प्रश्न में दिया गया कथन आलोचना के क्षेत्र से संबंधित है, जिसमें आलोचक के मुख्य कार्य को परिभाषित किया गया है। कथन के अनुसार, आलोचक का प्रधान कार्य काव्य शास्त्र के स्थापित सिद्धांतों की सीमा से ऊपर उठकर साहित्य में निहित सौन्दर्य का उद्घाटन करना है। इसका अर्थ है कि आलोचना केवल नियमों और सिद्धांतों का पालन करना नहीं है, बल्कि कृति के अंतरंग सौंदर्य को पहचानना और उसे पाठकों के सामने लाना है।
यह विचार उस आलोचना पद्धति से जुड़ा है जो कृति के भाव पक्ष और सौंदर्य पक्ष को महत्व देती है, बजाय इसके कि वह केवल शास्त्रीय नियमों पर आधारित हो। इस प्रकार की आलोचना पाठक को कृति का रसास्वादन करने में सहायता करती है और उसके सौंदर्य बोध को बढ़ाती है।
प्रस्तुत कथन हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक नंद दुलारे वाजपेयी का है। वाजपेयी जी अपनी आलोचना में सौंदर्यवादी दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने काव्य के सौंदर्य तत्व और पाठक के अनुभव पर विशेष बल दिया। उनका मानना था कि आलोचक का कर्तव्य है कि वह कृति के सौंदर्य का रहस्योद्घाटन करे, भले ही इसके लिए उसे परंपरागत काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों से हटकर विचार करना पड़े।
संक्षेप में, कथन का मुख्य भाव यह है कि:
यह दृष्टिकोण नंद दुलारे वाजपेयी की आलोचना पद्धति का केंद्रीय तत्व है। अन्य विकल्प जैसे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, और बाबू श्यामसुंदर दास की आलोचना पद्धतियाँ भिन्न रही हैं, यद्यपि उनका योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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